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आखिर मैं बता ही देता हूँ अपने लेट होने की वजह

एक चिड़िया घर में एक तोते के पिंजरे के बाहर लिखा था 
English, हिंदी और Haryanvi बोलने वाला तोता
एक आदमी ने इस बात को टेस्ट करने के लिए तोते से पहले ENGLISH में पूछा --
हू आर यू ?
तोता -- आई ऍम पैरेट
आदमी (हिंदी में) -- तुम कौन हो?
तोता -- मैं एक तोता हूँ
आदमी (इस बार Haryanvi में)-- तूं कूण स रै 
तोता -- मैं तेरा फुफा...
दो बार बता लीया समझ ना आता के
मुझे लगता है, मैं बहुत प्रतिभाशाली बालक हूं. ट्रे से निकालकर कच्ची बरफ खा सकता हूं, तरबूज को बीज समेत गटक सकता हूं. पैर की हड्डी चटका सकता हूं. आंख के नीचे उंगली लगाकर एक चीज को दो करके देख सकता हूं. कागज का पड़ाका बना सकता हूं. फेसबुक पोस्ट पर क्रांति कर सकता हूं. यूट्यूब पर चैनल बनाकर तहलका मचा सकता हूँ । रातों को सपने मे बहुत बड़ा आदमी बन सकता हूँ ,सबसे बड़ी बात मैं जो चाहूँ वो सोच सकता हूँ । लेकिन जब काम करने की बारी आती है तो मेरी सारी होशियारी धरी  रह जाती है.



मेरे बॉस को लगता है कि मैं मक्कार हूं, जान-बूझकर लेट होता हूं. उन्हें मैं ये नहीं समझा पाता कि मैं मुनीर नियाजी फैन क्लब वाला नहीं नक़्श लायलपुरी फैन क्लब वाला हूं. मेरे मोबाइल पर ‘हमेशा देर कर देता हूं’ वाला वीडियो नहीं है. मेरे मोबाइल में ‘मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है’ वाला ऑडियो है. काश मैं उन्हें समझा पाता कि लेट होना तो इश्क की तरह है. आप लेट होते नहीं हैं, हो जाते हैं.

1. आप बच्चे थे. आप सपना देखते थे कि सूसू आई है. आप उठे बाथरूम तक गए. सूसू भी की और आकर वापस लेट गए. सुबह उठने पर पता लगता था सूसू तो आपने की है. लेकिन बाथरूम में जाकर नहीं. अपने ही बिस्तर पर कर दी है. आप भले स्वीकारें या न स्वीकारें आपने ये किया है और ये आदत छुड़ाने के लिए आपके घर वालों ने आपको छुहारे भिगोकर भी खिलाए हैं. यही मेरे साथ होता है, मैं उठता हूं, नहाता हूं, कैब बुलाता हूं, दफ्तर भी जाता हूं और काम भी शुरू कर देता हूं. मैं पूरा मन लगाकर ईमानदारी से काम कर रहा होता हूं तभी मुझे ये रियलाइज होता है कि ये सब मैं सपने में कर रहा हूं. अब क्योंकि ईमानदारी सबसे बड़ी चीज होती है, इसलिए मैं मन लगाकर सपने में ही काम करता रह जाता हूं और शिफ्ट ख़त्म करने के चक्कर में दफ्तर के लिए लेट हो जाता हूं.

. मैं खुश रहने के चक्कर में लेट हो जाता हूं. मैं जब इंजीनियरिंग करता था तब इंजीनियरिंग की किताबों के अलावा हर चीज में मेरा मन लगता था. दीवार देखना भी इतना इंट्रेस्टिंग काम लगता था कि मैं घंटों उसे निहारता रह जाता बस किताब न देख पाता. आजकल फिर वैसा ही होने लगा है, मुझे छोटी-छोटी चीजें खुशियां देने लगी हैं. सर्दियों में मैं नहाने जाता हूं, तो गरम पानी इतना अच्छा लगता है कि घंटों नहाता रह जाता हूं. गर्मी में ठंडा-ठंडा पानी जब शरीर में पड़ता है, तो मैं उसे महसूस करता रह जाता हूं. बालों में शैम्पू करता हूं तो उसके बुलबले मुझे खुशियां देते हैं. एक दिन हाथ में साबुन लगा रहा था. नहाते-नहाते फुग्गा फुलाने की सूझी. उस दिन से मेरी साबुन से फुग्गे फुलाने की आदत पड़ गई है. अब मैं हर दिन ऑफिस के लिए लेट भले हो जाता हूं, लेकिन अच्छा ये है कि फुटबॉल के बराबर साबुन के फुग्गे फुलाना सीख गया हूं.

विचारों के चक्कर में भी मैं दफ्तर के लिए लेट हो जाता हूं. अब मैं देश समाज के लिए सोचने लग गया हूं. बढ़ती आबादी, ग्लेशियर्स का पिघलना, ग्लोबल वार्मिंग, टिक टॉक पर लड़कों का बिस्किट के गहने पहनना, ये सब मुझे रात-रात भर सोने नहीं देता. जब इन चिंताओं से छुटकारा मिलता है, तो सोचने लगता हूं, अच्छा इंसान कैसे बनूं? क्या करूं कि मेरी वजह से किसी को कष्ट न पहुंचे. यही हिसाब लगाने के चक्कर में रात के तीन बज जाते हैं. अब जो आदमी रात के तीन बजे सोएगा, सुबह दफ्तर समय पर कैसे जाएगा? और आप सब तो जानते ही हैं, सर्वश्रेष्ठ विचार टॉयलेट में ही आते हैं. वहां बैठकर ऑफिस में प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के इतने बेहतरीन आइडियाज आते हैं, जो ऑफिस की बेहतरी के लिए ही मुझे ऑफिस जाने के लिए लेट करा देते हैं.

इन कारणों पर शायद आपको भरोसा नहीं हो रहा हो. तो मैं एक जेनुइन कारण बताता हूं. मैं कैब वालों की वजह से लेट हो जाता हूं. मैंने खुद को ठेलकर सब काम समय पर कर लिए. एकदम सही समय पर मैंने ऑफिस निकलने को कैब भी मंगा ली, लेकिन कैब वाले ने आने में 15 मिनट बता दिए, क्योंकि दफ्तर जाने के समय पर डिमांड ज्यादा होती है, इसलिए मैंने इंतज़ार भी कर लिया. लेकिन अब कहानी में ट्विस्ट आया13वें मिनट पर कैब वाले ने कैब कैंसिल कर दी. और इतिहास गवाह है, अगर एक कैब वाले ने आपकी कैब कैंसिल कर दी, तो पीछे से दो कैब वाले और आपको उठाने से मना कर ही देंगे. इस सब में 10 मिनट और निकले. अगली कैब ने आने में सात से आठ मिनट लगा दिए और इस तरह से मैं एक बार फिर दफ्तर के लिए लेट हो गया. और हां, एक बात तो मैं बताना ही भूल गया, जिस दिन मैं ऑफिस के लिए लेट होता हूं, उसी दिन कैब वाले भी शहर के सारे दर्शनीय स्थल दिखाने के मूड में होते हैं. ‘डिस्कवर न्यू पाथ्स’ वाले ज़ोन में गए कैब वाले भैया उस दिन शहर के सारे नए बने फ्लाईओवर और अनदेखे रास्ते मेरे साथ ही डिस्कवर करते हैं.

गरीबी में आटा गीला वाली बात तो आप सब जानते ही होंगे. ऐसा ही लेट होने के साथ भी होता है. जब आप लेट हो रहे हैं, तभी दुनिया को आपसे काम पड़ता है. घर से मम्मी का फोन आता है कि बाउंड्री बनवा लें या गेट के बगल में बर्फी वाली जाली लगवा दें. पापा कहेंगे उनके फोन का रिचार्ज आज सुबह ही ख़त्म हुआ है, 84 दिन वाला रिचार्ज तत्काल करा दें. अत्काल की अलग मार है, कॉलेज के दोस्त का कॉल आएगा कि उसकी मौसी का बेटा हैदराबाद में है. कल ही लौटना है. आज तत्काल में उसका ट्रेन टिकट कराना है. मैं अपने उस परिचित का नंबर दे दूं, जो शर्तिया तत्काल टिकट करता है. इन सब कॉल्स से एक बार बचें भी तो खुद ऑफिस से कॉल आने लगते हैं कि मैं अब तक पहुंचा क्यों नहीं? ‘अरे मैं इसलिए नहीं पहुंचा क्योंकि मैं लेट हूं और लेट इसलिए हूं क्योंकि फोन पर सबको ये बता रहा हूं कि मैं दफ्तर के लिए लेट हूं, फोन बाद में कर लेना.’

 एक तथ्य आप सब जानते हैं कि आदमी आम दिनों में बहुत लेट नहीं होता. पांच से दस मिनट ही लेट होता है, और यही विवाद का कारण बनता है. इसके लिए बड़े ऑफिस ज़िम्मेदार होते हैं. गाड़ी से उतर कर मैं पहले गेट की चेकिंग पार करूंगा. फिर मुग़ल-गार्डन जितना बड़ा ऑफिस का बगीचा पार करूंगा. जिसमें तीन मिनट लगेंगे. उसके बाद सीमेंट का बड़ा सा धरातल आएगा, जो सहारा के मरुस्थल का आभास देगा. उसके बाद पानी से भरा कोई तालाब भी मिल जाएगा, जो साज-सज्जा के लिए इसी हफ्ते बनाया गया है, और उसे कर्मचारियों को तैर कर पार करना होता है. उसके बाद एचआर वालों ने साहसिक गतिविधियां और टीम भावना बढ़ाने के लिए ज्वालामुखी वाला सेटअप तैयार किया होगा. उसे फायरसूट पहनकर पार करना होगा. उसके बाद मैं ऑफिस की मुख्य बिल्डिंग में पहुंचता हूं. जिसका रिसेप्शन ही किसी मॉल जैसा होता है. उस रिसेप्शन को पार करते-करते मेरी मॉर्निंग वॉक जितनी कैलोरी बर्न हो जाती है. उसके बाद लिफ्ट एरिया में पहुंचना होता है, जहां हर रोज़ एक खाली लिफ्ट मेरे बटन दबाने से एक नैनो सेकेंड पहले छूट जाती है. दो मिनट बाद लिफ्ट आ भी गई तो मेरे फ्लोर तक पहुंचने के पहले वो हर फ्लोर पर रुकती है. फ्लोर के लिफ्ट एरिया से मेरी डेस्क की दूरी तय करने में एक युग लग ही जाता है. अब आप ही बताइए, मेरा दफ्तर इतना बड़ा है तो क्या ये मेरी ग़लती है?

. इसके अलावा कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन पर न आपका बस चलता, न मेरा. आप शहरों को तो जानते ही हैं. वहां जेसीबी की खुदाई चलती ही रहती है. किसी रोज़ मैं जेसीबी की खुदाई देखने लगा तो लेट हो जाता हूं. अब समय पर आने के लिए मैं जेसीबी की खुदाई तो छोड़ न दूंगा. समय पर न आने का कारण समय भी है. हम समय को संपूर्णता में नहीं देखते. समय तो सापेक्ष है. हम खुश हैं तो समय जल्दी बीतता है, दुखी हैं तो एक-एक सेकेंड भारी लगता है. ऐसे में देर या जल्दी को हम समय के हिसाब से कैसे तय कर सकते हैं. हम दुनिया को थ्री डी में देखने के आदी हो गए हैं, फोर डी में मैं लेट हूं ही नहीं. कुर्सी है, ऑफिस है, मैं नहीं हूं. इसका मतलब ये नहीं कि मैं लेट हूं. कभी न कभी उस कुर्सी पर मैं था. मुझे क्वांटम का उतना ज्ञान तो नहीं है, लेकिन फिल्मों के हिसाब से समय की अलग-अलग धाराएं होती हैं. समय की किसी धारा में मैं नहीं हूं, इसका ये मतलब थोड़े कि मैं हर धारा में Late था. किसी दुनिया और किसी और समय में मैं सही समय में ऑफिस आया हूं, आप देख नहीं पा रहे हैं, तो ये आपकी ग़लती है.

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