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दिल्ली अनाज मंडी आग: मरने से पहले दोस्त को फोन किया, 'भाई टाइम कम बचा है'

दिल्ली अनाज मंडी आग: मरने से पहले दोस्त को फोन किया, 'भाई टाइम कम बचा है'



इमारत की दूसरी मंज़िल पर आग लगी. तीसरी और चौथी मंज़िल पर जो लोग थे, उसके बचकर भागने का रास्ता ब्लॉक हो गया. अंदर फंसे लोगों में से कई ने अपने आख़िरी पलों में दोस्त-परिवार को फोन किया. उन्हें बताया कि अब वो नहीं बचने वाले. दाहिनी तरफ एक मृतक के रिश्तेदार की तस्वीर है, जो लोक नायक अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड के बाहर खड़ा है 


ये शायद सबसे भीषण ख़ौफ़ है. जब आपको पता हो कि अगले कुछ मिनटों में आप मरने वाले हैं. और मरने से पहले की उन गिनी-चुनी घड़ियों में आप किसी अपने से विदा लें. आमने-सामने भी नहीं. फोन पर. कितना निरीह है ये. 8 दिसंबर को दिल्ली की अनाज मंडी में भीषण आग लगी. इसमें 43 लोग मारे गए. मरने वालों में एक नाम मुशर्रफ अली का भी है. 32 साल के मुशर्रफ उस इमारत में फंसे थे. धुएं से उनका दम घुट रहा था. जब उन्हें लगा, अब वो नहीं बचेंगे तो उन्होंने अपने दोस्त मोनू को फोन किया. उनसे कहते रहे, मेरे बच्चों का ख़याल रखना भाई. इस बातचीत की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग शेयर हो रही है. फोन पर हुई इस बातचीत का ऑडियो सुनते हुए आपको मालूम चलता है. कि कब मुशर्रफ की सांसें बंद हो गईं.

‘मर भी जाऊंगा, तो वहीं रहूंगा मैं’
करीब सात मिनट की बातचीत है ये. इसे सुनते हुए आप इतना निरीह, इतना बेबस महसूस करेंगे कि हद ही नहीं. आपको मुशर्रफ की डरी हुई आवाज़ सुनाई देगी. जो सांस लेने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है. एक रट लगी है कि अब नहीं बचने का मैं. दोस्त कहता है वो भागने की कोशिश करें. मुशर्रफ उन्हें बताते हैं कि भागने की कोई जगह नहीं. दोस्त पूछता है कि क्या फायर ब्रिगेड वाली गाड़ी नहीं पहुंची. मुशर्रफ नाउम्मीद हो गए हैं. कहते हैं, किसी ने किया होगा फोन. उनके बोलने में बस दो भाव हैं. एक, ये निश्चय कि अब वो मरने ही वाले हैं. कि उनका बच पाना मुमकिन नहीं. दूसरा, गिड़गिड़ाहट. वो बार-बार अपने दोस्त से कहते हैं कि वो उनके बच्चों, उनके परिवार का ध्यान रखे. मुशर्रफ कहते हैं-

भैया, ख़त्म होने वाला हूं आज मैं. टाइम कम बचा है, भागने का रास्ता नहीं है. मेरे परिवार का ख़याल रखना. तू ही है अब भाई.



मुशर्रफ कहते हैं-


मर भी जाऊंगा, तो वहीं रहूंगा मैं.

बीवी और तीन बच्चे…
मुशर्रफ अली उत्तर प्रदेश के बिजनौर के रहने वाले थे. वो दिल्ली कमाने-खाने आए थे. उनके परिवार में बीवी और तीन बच्चे हैं. मोनू से बात करते हुए उन्होंने आख़िरी लाइन कुछ यूं कही कि फलां आदमी से पांच हज़ार रुपये दिलवा देना. दोस्त ने आश्वसान दिया. उसके बाद बस मुशर्रफ की सांसों की आवाज़ रह गई फोन पर. छोटी-छोटी सांसें. जो बेहद दम लगाकर ली जा रही थीं. फिर सांसें और भी छोटी होती जाती हैं. और फिर रुक जाती हैं. आप रिकॉर्डिंग सुनते हुए उसकी आख़िरी सांस महसूस करते हैं. और किसी के मरने के पल का, उस पल की बेबसी का चश्मदीद बनकर आपको कितनी पीड़ा होती है, ये बताने के लिए शब्द नहीं बने.


मुशर्रफ अकेले नहीं थे, जिन्होंने अपनी मौत को महसूस कर अपने घरवालों-नज़दीकियों से आख़िरी विदा ली हो. मरने वालों में और भी कई लोग थे, जिन्होंने अपने परिवार को फोन करके बताया कि वो मरने वाले हैं. कोई फोन पर जान बचाने के लिए गिड़गिड़ाया. कोई अपने बाद अपने परिवार का ध्यान रखने की ताकीद देकर गया.

पढ़िए: दिल्ली में भीषण आग से हुई 43 मौतों का जिम्मेदार कौन, समझ लीजिए


‘दैनिक जागरण’ में छपी ख़बर के मुताबिक, इस आग में दो सगे भाई भी मारे गए. इमरान और इकराम. दोनों भाई बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले थे. आग लगी, तो इकरान ने घर पर अपने पिता को फोन किया. कहा- हम फंस गए हैं, अब्बा. इमरान और इकराम के चचेरे भाई साज़िद की भी इसी वारदात में मौत हुई. ‘दैनिक जागरण’ ने अफ़साद की भी कहानी बताई है. वो पांच साल से फिल्मिस्तान के इस कारखाने में काम कर रहे थे. 9 दिसंबर को उन्हें घर के लिए रवाना होना था. मगर इससे पहले ही जीवन ख़त्म हो गया. इस ख़बर में सादिक का भी ब्योरा है. वो भी नहीं रहे. सादिक के दोस्त निराला ने ‘दैनिक जागरण’ को बताया कि सादिक इस इमारत की तीसरी मंज़िल पर काम करते थे. आग लगने पर वो इमारत से बाहर निकल आए थे. मगर बाहर जाकर महसूस हुआ कि वो अपना मोबाइल अंदर ही भूल आए हैं. वो मोबाइल लेने लौटे. मगर बाहर आने की स्थिति नहीं रही. आग बहुत प्रचंड हो गई थी.

ज़्यादातर लोग बिहार के थे…
8 दिसंबर की सुबह 4.50 से पांच बजे के बीच कभी आग शुरू हुई. साढ़े पांच बजे के करीब फायर ब्रिगेड की गाड़ियां मौके पर पहुंची. जहां आग लगा थी, उस इमारत के अंदर कई लोग मौजूद थे. सुबह का वक़्त था, तो ज़्यादातर सो रहे थे. सुबह के 9.45 बजे NDRF की टीम भी पहुंची. इमारत के अंदर कार्बन मोनो ऑक्साइड भर गया था. उसकी वजह से लोगों का दम घुटा और उनकी जान गई. 63 के करीब लोग इमारत से निकाले गए. इनमें से 43 की मौत हो चुकी थी. मरने वालों में कम-से-कम पांच नाबालिग बताए जा रहे हैं. ज़्यादातर मरने वाले बिहार के थे. ख़बरों के मुताबिक, सबसे ज़्यादा समस्तीपुर के नौ, सहरसा के छह, सीतामढ़ी के पांच और मुजफ़्फरपुर के तीन लोगों की मौत हुई.


न फायर क्लियरेंस था, न सेफ्टी के उपकरण थे

जिस चार मंजिला इमारत में आग लगी, वो फिलिस्तान इलाके में है. इमारत के पास फायर क्लियरेंस नहीं था. न ही आग लगने की स्थिति में सुरक्षा का, आग को बुझाने का ही कोई उपकरण था. इमारत के अंदर ज्वलनशील पदार्थ भी थे. आशंका है कि शॉर्ट सर्किट के कारण इमारत की दूसरी मंजिल से आग शुरू हुई. चूंकि आग दूसरी मंज़िल से ही शुरू हुई थी, तो तीसरी और चौथी मंज़िल वालों के लिए भागने का कोई रास्ता ही नहीं बचा. दमकल विभाग के करीब 150 लोग आग बुझाने और लोगों को बचाने की कोशिश में जुटे रहे. मगर इलाका बेहद तंग होने की वजह से काफी मुश्किलें आईं. दिल्ली सरकार ने इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं. इमारत के मालिक को पकड़ लिया गया है.

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