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New 2021 Best evergreen Shayari status in Hindi

New 2021 Best evergreen Shayari status in Hindi


 चलो आज फिर थोडा मुस्कुराया जाये,

बिना माचिस के कुछ लोगो को जलाया जाये.....!!!

masth shayari


जैसा भी हूं अच्छा या बुरा अपने लिये हूं,

मै खुद को नही देखता औरो की नजर से….!!!


बस इतनी सी बात पर हमारा परिचय तमाम होता है,

हम उस रास्ते नही जाते जो रास्ता आम होता है…........!!!


ये मत समझ कि तेरे काबिल नहीं हैं हम,

तड़प रहे हैं वो जिसे हासिल नहीं हैं हम.....!!!


आग लगाना मेरी फितरत में नही है,

मेरी सादगी से लोग जलें तो मेरा क्या कसूर......!!!


लोग मुझे अपने होंठों से लगाए हुए हैं,

मेरी शोहरत किसी के नाम की मोहताज नहीं......!!!


लाख तलवारे बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ,

सर झुकाना नहीं आता तो झुकाए कैसे.........!!!


हम तो इतने रोमान्टिक है की हम अगर थोड़ी देर,

मोबाइल हाथ मै लेले.. तो वो भी गरम हो जाता है......!!!


सर झुकाने की आदत नहीं है,

आँसू बहाने की आदत नहीं है,

हम खो गए तो पछताओगे बहुत,

क्युकी हमारी लौट के आने की आदत नहीं है......!!!


राज तो हमारा हर जगह पे है,

पसंद करने वालों के "दिल" में और,

नापसंद करने वालों के "दिमाग" में.......!!!


मैं लोगों से मुलाकातों के लम्हें याद रखता हूँ,

बातें भूल भी जाऊं पर लहजे याद रखता हूँ.....!!!


छोड़ दी है अब हमने वो फनकारी वरना,

तुझ जैसे हसीन तो हम कलम से बना देते थे......!!!


समंदर बहा देने का जिगर तो रखते हैं लेकिन​,

​हमें आशिकी की नुमाइश की आदत नहीं है दोस्त​......!!!


मेरे बारे में अपनी सोच को थोड़ा बदल के देख​,

​मुझसे भी बुरे हैं लोग तू घर से निकल के देख​.....!!!


हम जा रहे हैं वहां जहाँ दिल की हो क़दर,

बैठे रहो तुम अपनी अदायें लिये हुए........!!!


रहते हैं आस-पास ही लेकिन पास नहीं होते,

कुछ लोग मुझसे जलते हैं बस ख़ाक नहीं होते.....!!!


दुश्मनों को सज़ा देने की एक तहज़ीब है मेरी,

मैं हाथ नहीं उठाता बस नज़रों से गिरा देता हूँ......!!!


बेवक़्त, बेवजह, बेहिसाब मुस्कुरा देता हूँ,

आधे दुश्मनो को तो यूँ ही हरा देता हूँ........!!!


अपनी शख्शियत की क्या मिसाल दूँ यारों

ना जाने कितने मशहूर हो गये, मुझे बदनाम करते करते.....!!!


न मैं गिरा और न मेरी उम्मीदों के मीनार गिरे,

पर कुछ लोग मुझे गिराने में कई बार गिरे........!!!


जो खानदानी रईस हैं वो, रखते हैं मिजाज़ नर्म अपना,

तुम्हारा लहजा बता रहा है तुम्हारी दौलत नई नई है…....!!!


उसने पुछा, कहाँ रहते हो,

मैने कहा, अपनी औकात मे रहता हुं......!!!


ख़त्म हो भी तो कैसे, ये मंजिलो की आरजू,

ये रास्ते है के रुकते नहीं, और इक हम के झुकते नही......!!!


हथियार तो सिर्फ शौक के लिए रखा करते है,

वरना किसी के मन में खौंफ पैदा करने के लिए तो बस नाम ही काफी है.....!!!


ऐसा नही है कि मुझमे कोई 'ऐब' नही है,

पर सच कहता हूँ मुझमें कोई 'फरेब' नहीं है........!!!


नमक स्वाद अनुसार,

अकड औकात अनुसार.......!!!


शब्द पहचान बनें मेरी तो बेहतर है,

चेहरे का क्या है,

वो मेरे साथ ही चला जाएगा एक दिन…..!!!


अंदाज़ कुछ अलग ही मेरे सोचने का है,

सब को मंज़िल का है शौख मुझे रास्ते का है.......!!!


तेरी मोहब्बत को कभी खेल नही समजा,

वरना खेल तो इतने खेले है कि कभी हारे नही….!!!


दादागिरी तो हम मरने के बाद भी करेंगे,

लोग पैदल चलेंगे और हम कंधो पर…...!!!


मुझे एक ने पूछा "कहा रहते हो"

मैंने कहा "औकात मे"

साले ने फिर पूछा "कब तक"

मैंने कहा "सामने वाला रहे तब तक"..........!!!


नफरत भी हम हैसियत देख कर करते है,

प्यार तो बहुत दूर की बात है........!!!


एक पल जो हमें भूलता ही न था

एक पल जो हमें भूलता ही न था,

भूल जाएगा यूँ भूलता ही नही।

दूर जाना ही था दूर जाता तो पर 

दूर जाएगा यूँ भूलता ही नहीं।


रह गयी है अयोध्या भरत के बिना 

जानकी के बिना राम वनवास है।

पार्थ को त्याग रण में दिया कृष्ण ने,

शास्त्र बिन व्यर्थ का शस्त्र अभ्यास है।


दुख में दुःख ना उठाता तो दुःख ही ना था

मुस्कुराएगा यूँ भूलता ही नहीं ।


श्याम ने कब कहा था कोई राधिका,

या कि मीरा करे मात्र उनका भजन,

तीर्थ उपवास व्रत अर्चना के बिना,

जिनको रहना था वे देवता थे मगन,


भक्त भगवान की भक्ति की क़ीमतें 

कुछ चुकाएगा यूँ भूलता ही नहीं।


पंछियों से कहा छोड़ आकाश दें,

मछलियों से कहा छोड़ दें वे नदी।

भूत सर पर चढ़ा है नयी चाह का 

ख़ाक में जाएँ रिश्ते व नेकी बदी,

प्रस्तुतकर्ता Unknown पर 9:22 pm 4 टिप्‍पणियां: 

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सवैये (लोक की रीति)

आप सुनो 


लोक की रीति में हूँ उलझा मन चाहे बहूँ पै बहा नहिं जाए 

आप सुनो तो कहूँ मन की न सुनो यदि आप कहा नहि जाए,

सांप छछून्दर की गति है न कहूँ तो कहे से रहा नहिं जाए।

बोल किसी का चुभा इतना इतना इतना इतना कि सहा नहि जाए 


रंग लगा गयी गाल पे जो हम चाह के भी तो छुड़ा नहि पाए 

फ़ूल की गंध में लीन रहे बस फ़ूल की गंध चुरा नहि पाए 

हाथ हिला गए आप चले हम चाह के हाथ हिला नहिं पाए 

नैन से दूर गए तुम तो किसी और से नैन मिला नहि पाए 



पत्र पठाए कई सब लौट के आए तुम्हारा पता नही पाए 

पाँव चले कई मील चले पर ठीक कोई रस्ता नहि पाए 

सूरज ही ना मिला ढलता हुआ चाँद  नहीं उगता हुआ पाए 

प्यार किया तुमसे तुमसे पर बात यही कि बता नहि पाए।



आए तो आप बुलाए नही जो बुलाए भी तो हम आ नहि पाए 

जा तो रहे थे कि जाएँ चले जब जाने लगे तब जा नहि पाए 

एक तुम्हीं न मिली मुझको हम और भला अब क्या नहिं पाए 

प्यार मिला दुनिया का हमें हम ही अपनी दुनिया नहि पाए 


प्यार बड़ा महँगा था बाज़ार में और कहीं सस्ता नहि पाए

प्यार किया जिसने उसको हम तो न कभी हँसता हुआ पाए 

बात यही इतनी जितना समझे उतना समझा नहि पाए,

आग में पानी मिले कितना पर पानी को आग कहा नहि जाए,


बाग़ को ताल बता न सके हम ताल को बाग़ बता नहि पाए 

काव्य धरा पर घूम रहे हम काव्य आकाश में जा नहिं पाए 

चाह नही सुनने की जहाँ वहाँ चाह के भी हम गा नहि पाए 

आप बुला न सके मुझको न बुला सके आप तो आ नहि पाए 


राह न यूँ बदलो अपनी हम यूँ नही  तेरी राह में आए,

बाँह न जाने खुली कितनी पर एक तुम्हारी ही बाँह में आए,

थाहते थाहते सिन्धु कई अब नैन के सिन्धु अथाह में आए।

नैन हटे लगा आम की छाँह को छोड़ बबूल की छाँह में आए।



बालपना गुज़रा है अभाव में साहब सेठ नही बन पाए 

और जवान हुए तब रूप शिकारियों ने खूब जाल बिछाये 

चोर मिले चितचोर मिले पर चोरी में जा न सके हैं चुराए 

हाथ तुम्हारे लगे हम वो जो कभी भी किसी के भी हाथ न आये ।


मैं न कभी मिल पाता  तुम्हें मिलवाए गये हैं तभी मिल पाए ।

सत्य यही है कि ईश्वर चाह रहा था तुम्हें मुझसे चहवाये।

चाह ले दो दिल दूर करे वह चाह ले दो बिछड़ों को मिलाए।

चाह उसी की गजेन्द्र जहाँ पर शूल उगे वहाँ फ़ूल खिलाए 


चाह ले राई पहाड़ करे वह चाहे पहाड़ को राई बनाए 

चाहे तो भीख मंगा दे गली गली चाहे तो वी ठकुराई दिलाए 

चाह ले वो दुर्योधन का घर त्याग दे साग विदूर के खाए,

चाह ले तो कुटिया में रहे चाहे स्वर्ण की लंका में आग लगाए।


प्यार की रीति निबाह दो प्यार मिले न मिले यूं निबाहने वाला।

रूप तुम्हारा समन्दर है दिल मेरा समन्दर थाहने वाला।

यौवन भार से देह झुकी इसे चाहिए कोई सम्हालने वाला 

चाह नही तुम्हें आज मेरी कल चाह रहेगी न चाहने वाला।

प्रस्तुतकर्ता Unknown पर 9:20 pm 1 टिप्पणी: 

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तुम नहीं हो तो

तुम नही हो तो तुम्हारी याद साथी है 

याद ऐसी जो तुम्हारे बाद साथी है।


मै अकेला कब रहा तुम थे हमारे साथ मन में 

सामने जब थे तो थे नहीं थे तो थे जज्बात मन में, 

प्यार के आगे भला क्या टिक सकेंगी दूरियां भी

कुछ नही रहता तो रहती है तुम्हारी बात मन में। 

मरहमों से क्या गिला आघात साथी है, 

तुम नहीं हो तो तुम्हारी......................।


विरह में जलकर भी हमने बस तुम्हार ताप देखा, 

बस तुम्हें देखा किसी को देखने में पाप देखा 

प्यार में मर मर के जीना कोई क्या दिखलायेगा 

जो भी देखा प्यार करके मैने अपने आप देखा। 

स्वर नहीं तो मौन का संवाद साथी है।

तुम नहीं हो तो तुम्हारी......................।


तन भले है दूर कितना मन मे अब भी चित्र तेरा,

आज इन टेंसू के फूलों ने जिसे फिर फिर उकेरा 

ओ हवा रुक जा तनिक उपहार दे देना उसे कुछ 

स्वांस की खूशबू से खुश हो जाएगा वह मित्र मेरा 

और कहना उम्र भर अवसाद साथी है ।

तुम नही हो तो तुम्हारी याद.......।

प्रस्तुतकर्ता Unknown पर 9:19 pm कोई टिप्पणी नहीं: 

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जिसको गीत सुनाने

जिसको गीत सुनाने को मै,

रात रात भर भटक रहा हूँ,

पता नही किस राजभवन में 

सुख की नींद सो रही होगी,


हवा उधर से इधर आ रही और उधर भी जाती होगी,

मैने याद किया है जिसको याद उसे भी आती होगी,

जिसकी याद भुलाने खातिर,

हम मथुरा से गये द्वारिका,

पता नहीं किस वृन्दावन में,

वह उम्मीद बो रही होगी।


जाने किसके कुटिल अधर ने रंग अधर का लूटा होगा

कसमसाया होगा कितना पर कंगन अभी न टूटा होगा,

जिस पर रंग चढाने खातिर,

सब सांसें हो गयी होलिका,

पता नही किस आलिंगन में 

वह बकरीद हो रही होगी


जाने किसकी क्रूर उंगलियां खेल रही होंगी अलकों से,

जिन्हें संवारा करते थे हम अपनी इन भीगी पलकों से,

जिसको पास बुलाने खातिर

हम ही खुद से दूर हो गए,

पता नही किस आवाहन में,

सुनकर गीत रो रही होगी।

प्रियान्शु गजेन्द्र

प्रस्तुतकर्ता Unknown पर 9:18 pm कोई टिप्पणी नहीं: 

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जगमग दिन

जगमग दिन रोशन रहे रात,

घर उतरे तारों की बारात,

बस इतने तक तो रहा साथ आगे पथ एक नही तो क्या?

सारा जग साथ तुम्हारे है बस मैं ही एक नहीं तो क्या?


पर्वत निश्चल रह जाते हैं अक्सर नदियाँ बह जाती हैं,

फूलो का डाली से विछोह गुमसुम बगिया सह जाती है

क्या हुआ कलाई को उनकी कंगन स्वीकार नही मेरे,

क्या हुआ अगर अरमानों की चूड़ियाँ रखी रह जाती हैं?

अब तक तो सब स्वीकार किया,

इतने दिन तक तो प्यार दिया,

माटी तो चंदन हुई अगर होगा अभिषेक नही तो क्या ?

सारा जग .............................................?


इतने दिन प्यार दिया तुमने है बहुत बहुत आभार प्रिये,

मधुमासों को मिलना ही था यह पतझर का उपहार प्रिये,

नीरस पतझर के हाथों का जीवन भी एक खिलौना था,

दुख है इन घायल हाथों से मैं कर न सका शृंगार प्रिये,

नभ से तारे मैं ला सका,

इसलिए तुम्हें मैं पा न सका,

माथा तो लाए चौखट तक यदि पाए टेक नही तो क्या ?

सारा जग .............................................?


अपना सब कुछ देकर बैठे फिर भी तुमको हम पा न सके,

तुम गीत समय का थी तुमको नीरस अधरों पर ला न सके,

संसार भले कुछ भी समझे जो समझे उसे समझने दो,

जो तुम समझे वह था ही नही जो था वह हम समझा न सके।

जो था वह था अब जाने दो,

अब स्वर्णिम संध्या आने दो,



किस तरह गाऊँ समय की वेदनाएँ,

मर चुकी हों जब सभी संवेदनाएं।

कब लिखा इतिहास ने उनकी कहानी,

खो गयी जिनकी निशानी,


खेल लहरों से भँवर में खो गए,

देश की नौका चलाकर सो गए,

वन जो खाण्डव इन्द्रप्रस्थी बन गए तो 

शक्तिशाली कौरवों के हो गये।


पांडवों को है उमर वन में बितानी।

खो गयी जिनकी निशानी।


भाग्य से यूँ कर्म की दूरी मिली ,

स्वर्ग रच डाला न मज़दूरी मिली,

मौत भी आयी तो तब जब मर चुके थे,

ज़िन्दगी को ऐसी मजबूरी मिली।


राजपथ पर है लहू नयनों में पानी।

खो गयी जिनकी निशानी।


घोषणाएँ मार्ग में सोती मिली,

मर गयी जब भूख तब रोटी मिली,

देह जब निर्वस्त्र होकर गिर गयी तो,

राजधानी से नयी धोती मिली।


हो गए भिक्षुक समय के साथ दानी,

खो गयी जिनकी निशानी ।




मै आंसू बेंच रहा हूं

मै आँसू बेंच रहा हूँ 

है जग में कोई ख़रीदार जो ले ले और मुझे दे दे,

मुस्कान अधर पर दो पल की,

क्या है कोई ?


आए प्राणों को ले निकाल उनके इन मेरे प्राणों से,

पल भर को नदिया दूर करे अगमित उत्ताल पहाड़ों से,

क्या है कोई जो हटा सके बरसों से जमी हुई पीड़ा,

छाती से अचल हिमाचल की 

क्या है कोई ?


आँखों से दूर करे चेहरा,पहचान मिटा दे ख़्वाबों से,

पौधों से अलग करे माटी,ख़ुशबू को अलग गुलाबों से,

क्या है कोई जो बरसों से रुनझुन सुनते इन कानो से

आवाज मिटा दे पायल की,

क्या है कोई?


सपनो के अतल समन्दर से यादों के मोती ले निकाल,

मछली को जल से दूर करे जल में संयम का जाल डाल,

क्या है कोई इस दुनिया में जो तपती विरह दोपहरी में,

बिसरा दे सुधियाँ आँचल की,

क्या है कोई ?


प्रियांशु गजेन्द्र

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