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SAD SHAYARI STATUS

 जिसके नसीब मे हों ज़माने की ठोकरें,

उस बदनसीब से ना सहारों की बात कर।

SAD SHAYARI STATUS PIC



बुला रहा है कौन मुझको उस तरफ,

मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेक़रार है।



वो तेरे खत तेरी तस्वीर और सूखे फूल,

उदास करती हैं मुझ को निशानियाँ तेरी।



वह मेरा सब कुछ है पर मुक़द्दर नहीं,

काश वो मेरा कुछ न होता पर मुक़द्दर होता।



दिल को बुझाने का बहाना कोई दरकार तो था,

दुःख तो ये है तेरे दामन ने हवायें दी हैं।



मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं,

हैं मौसम की तरह लोग... बदल जाते हैं,

हम अभी तक हैं गिरफ्तार-ए-मोहब्बत यारों,

ठोकरें खा के सुना था कि संभल जाते हैं।


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बेवक्त बेवजह बेसबब सी बेरुखी तेरी,

फिर भी बेइंतहा तुझे चाहने की बेबसी मेरी।



देखी है बेरुखी की आज हम ने इन्तेहाँ,

हमपे नजर पड़ी तो वो महफ़िल से उठ गए।




एक नजर भी देखना गंवारा नहीं उसे,

जरा सा भी एहसास हमारा नहीं उसे,

वो साहिल से देखते रहे डूबना हमारा,

हम भी खुद्दार थे पुकारा नहीं उसे।


काश वो समझते इस दिल की तड़प को,

तो हमें यूँ रुसवा न किया जाता,

यह बेरुखी भी उनकी मंज़ूर थी हमें,

बस एक बार हमें समझ तो लिया होता।


जब कभी फुर्सत मिले मेरे दिल का बोझ उतार दो,

मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो।



चलो अब जाने भी दो क्या करोगे दास्ताँ सुनकर,

ख़ामोशी तुम समझोगे नहीं और बयाँ हमसे होगा नहीं।



मिजाज को बस तल्खियाँ ही रास आईं,

हम ने कई बार मुस्कुरा कर देख लिया।


तुम्हारे बाद न तकमील हो सकी अपनी,

तुम्हारे बाद अधूरे तमाम ख्वाब लगे।


मेरी कोशिश कभी कामयाब ना हो सकी,

न तुझे पाने की न तुझे भुलाने की।


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पत्थर समझ कर पाँव से ठोकर लगा दी,

अफसोस तेरी आँख ने परखा नहीं मुझे,

क्या क्या उमीदें बांध कर आया था सामने,

उसने तो आँख भर के भी देखा नहीं मुझे।



मेरी जगह कोई और हो तो चीख उठे,

मैं अपने आप से इतने सवाल करता हूँ।



यकीन था कि तुम भूल जाओगे मुझको,

खुशी है कि तुम उम्मीद पर खरे उतरे।


.अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिसने भी मोहब्बत की,

मरने की दुआ माँगी जीने की सज़ा पाई।



गुजरा हूँ हादसात से लेकिन वही हूँ मैं,

तुम ने तो एक बात पे रस्ते बदल लिए।



नफरतें लाख मिलीं पर मोहब्बत न मिली,

ज़िन्दगी बीत गयी मगर राहत न मिली,

तेरी महफ़िल में हर एक को हँसता देखा,

एक मैं था जिसे हँसने की इजाज़त न मिली।


 

उदास कर देती है हर रोज ये शाम मुझे,

लगता है तू भूल रहा है मुझे धीर-धीरे।



नादानी की हद है जरा देखो तो उन्हें,

मुझे खो कर वो मेरे जैसा ढूढ़ रहे हैं।


इस मोहब्बत की किताब के,

बस दो ही सबक याद हुए,

कुछ तुम जैसे आबाद हुए,

कुछ हम जैसे बरबाद हुए।


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उसे जाने की जल्दी थी

तो मैं आँखों ही आँखों में

जहाँ तक छोड़ सकता था

वहाँ तक छोड़ आया हूँ।




उसकी बाहों में सोने का

अभी तक शौक है मुझको,

मोहब्बत में उजड़ कर भी

मेरी आदत नहीं बदली।



हालात ने तोड़ दिया हमें

कच्चे धागे की तरह,

वरना हमारे वादे भी कभी

जंजीर हुआ करते थे।


लम्हों की दौलत से दोनों ही महरूम रहे,

मुझे चुराना न आया, तुम्हें कमाना न आया।



ना जाने इस ज़िद का नतीजा क्या होगा,

समझता दिल भी नहीं मैं भी नहीं और तुम भी नहीं।



बिखरी किताबें भीगे पलक और ये तन्हाई,

कहूँ कैसे कि मिला मोहब्बत में कुछ भी नहीं।


अगर तुम समझ पाते मेरी चाहत की इन्तेहा,

तो हम तुमसे नहीं, तुम हमसे मोहब्बत करते।



हमें अपने घर से चले हुए,

सरे राह उमर गुजर गई,

न कोई जुस्तजू का सिला मिला,

न सफर का हक ही अदा हुआ।

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इतना भी इख्तियार नहीं मुझको वज़्म में,

शमाएँ अगर बुझें तो मैं दिल को जला सकूँ।



गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी,

वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह।



ये तो न कह कि किस्मत की बात है,

मेरी बरबादियों में तेरा भी हाथ है।


कुछ कटी हिम्मत-ए-सवाल में उम्र,

कुछ उम्मीद-ए-जवाब में गुजरी।



चंद कलियाँ निशात की चुनकर,

मुद्दतों मायूस रहता हूँ,

तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही,

तुझसे मिलकर उदास रहता हूँ।



बस यही बात कि किसी को ना चाहों दिल से,

तज़ुर्बे इस के सिवा उम्र को क्या देते हैं।


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क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो,

हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरे हैं।



नतीजा एक ही निकला,

कि थी किस्मत में नाकामी,

कभी कुछ कहके पछताए,

कभी चुप रहके पछताए।


मुमकिना फ़ैसलों में एक हिज्र का फ़ैसला भी था,

हम ने तो एक बात की उस ने कमाल कर दिया।


होशो-हवास और ताबो-तवाँ दाग़ जा चुके,

अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया।



खाते रहे फरेब संभलते रहे कदम,

चलते रहे जुनूं का सहारा लिये हुए।


कहते हैं उम्मीद पे जीता है जमाना,

क्या करे जिसकी कोई उम्मीद नहीं है।


तुम अपना रंजो-गम अपनी परेशानी मुझे दे दो,

तुम्हें मेरी कसम यह दुख यह हैरानी मुझे दे दो।

ये माना मैं किसी काबिल नहीं इन निगाहों में,

बुरा क्या है अगर इस दिल की वीरानी मुझे दे दो।


मुझे ये डर है तेरी आरजू न मिट जाये,

बहुत दिनों से तबियत मेरी उदास नहीं।


बारिश में भीगने के ज़माने गुजर गए,

वो शख्स मेरे शौक चुरा कर चला गया।

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अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं

तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी।


तुम ना लगा पाओगे अंदाजा मेरी तबाही का,

तुमने देखा ही कहाँ है मुझको शाम के बाद।


दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब,

क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो।


क़ैद ए मौसम से तबीयत रही आज़ाद उसकी,

काश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उसकी।


जब कि पहलू से यार उठता है,

दर्द बे-इख़्तियार उठता है।


ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत,

दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत।



न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है,

अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है।


जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी,

बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या।



 

एक कहानी सी दिल पर लिखी रह गयी,

वो नजर जो उसे देखती रह गयी,

वो बाजार में आकर बिक भी गए,

मेरी कीमत लगी की लगी रह गयी।



इधर से आज वो गुजरे तो मुँह फेरे हुए गुजरे,

अब उन से भी हमारी बेकसी देखी नहीं जाती।


वो कब का भूल चुका होगा हमारी वफ़ा का किस्सा,

बिछड़ के किसी को किसी का ख्याल कब रहता है।



 क्या अजीब था उनका मुझे छोड़ के जाना,

सुना कुछ नहीं और कहा भी कुछ नहीं,

कुछ इस तरह बर्बाद हुए उनकी मोहब्बत में,

लुटा भी कुछ नहीं और बचा भी कुछ नहीं।




रंज़िश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ,

आ फिर से मुझे छोड़ जाने के लिए आ।



इक झलक देख लें तुझको तो चले जाएंगे,

कौन आया है यहाँ उम्र बिताने के लिए।



हमने प्यार मोहब्बत नहीं इबादत की है,

रस्मों और रिवाजों से बगावत की है,

माँगा था हमने जिसे अपनी दुआओं में,

उसी ने मुझसे जुदा होने की चाहत की है।




दुनिया में तेरे इश्क़ का चर्चा ना करेंगे,

मर जायेंगे लेकिन तुझे रुस्वा ना करेंगे,

कुर्बान करेंगे कभी दिल जान तेरे सदके,

तुम अपना बना लोगी तो क्या क्या न करेंगे,

गुस्ताख़ निगाहों से अगर तुमको गिला है,

हम दूर से भी अब तुम्हें देखा ना करेंगे।



तेरी वफ़ा के तकाजे बदल गये वरना,

मुझे तो आज भी तुझसे अजीज कोई नहीं।


क्या अजीब खेल है इस मोहब्बत का भी,

किसी को हम न मिले और कोई हमें न मिला।



तमाम उम्र उसी के ख्याल में गुजरी,

जिसे उम्र भर मेरा ख्याल न आया।


तेरी ख़ामोशी, अगर तेरी मज़बूरी है,

तो रहने दे इश्क़ कौन सा जरुरी है।



पल पल उसका साथ निभाते हम,

एक इशारे पर दुनिया छोड़ जाते हम,

समन्दर के बीच में फरेब किया उसने,

कहते तो किनारे पर ही डूब जाते हम।



वो मायूसी के लम्हों में जरा भी हौसला देता,

तो हम कागज़ की कश्ती पे समंदर उतर जाते।

इधर से आज वो गुजरे तो मुँह फेरे हुए गुजरे,

अब उन से भी हमारी बेकसी देखी नहीं जाती।



माना कि तुमको प्यार नहीं,

नफ़रत ही जताने आ जाओ,

सदियों से जागी आँखों को,

एक बार सुलाने आ जाओ.




मैं ख़ामोशी हूँ तेरे मन की,

तू अनकहा अलफ़ाज़ मेरा,

मैं एक उलझा लम्हा हूँ,

तू रूठा हुआ हालात मेरा।


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कोई अच्छा लगे तो उनसे प्यार मत करना,

उनके लिए अपनी नींदे बेकार मत करना,

दो दिन तो आएँगे खुशी से मिलने,

तीसरे दिन कहेंगे इंतज़ार मत करना।



चेहरे पर ये उदासियाँ कैसी,

ये भी मुझसे सवाल करते हो,

मरना चाहे तो मर नहीं सकते,

तुम भी जीना मुहाल करते हो,

अब किस-किस की मिसाल दूँ तुमको,

तुम हर सितम बेमिसाल करते हो।


न कोई इल्जाम, न कोई तंज, न कोई रुसवाई,

दिन बहुत हो गए यार ने कोई इनायत नहीं की।


हर तरफ छा गए पैगाम-ऐ-मोहब्बत बनकर,

मुझसे अच्छी रही किस्मत मेरे अफ़साने की।



करना ही तंज़ है तो हँसने का क्या तकल्लुफ,

क्यूँ ज़हर दे रहे हो मोहब्बत मिला मिला कर।



बिछड़ के उस से परेशान बहुत हूँ मैं,

सुना है वो भी बड़ी उलझनों में रहता है।



बगैर जिसके एक पल भी

गुजारा नही होता,

सितम तो देखिए.

बस वही शख्स हमारा नही होता।


तू बेरूख हवा में चाहतों का दिया,

जलाने की ज़िद न कर,

ये क़ातिलों का शहर है,

यहाँ मुस्कुराने की ज़िद न कर।



 सिमट गयी मेरी ग़ज़ल भी चंद अल्फाजों में,

जब उसने कहा मोहब्बत तो है पर तुमसे नहीं।


तेरे मिलने का गुमान तेरे न मिलने की खलिश,

वक़्त गुजरेगा तो ज़ख्म भी भर जायेंगे।


दिल्लगी थी उसे हम से मोहब्बत कब थी,

महफ़िल-ए-गैर से उस को फुर्सत कब थी,

कहते तो हम मोहब्बत में फनाह हो जाते,

उस के वादों में पर वो हकीक़त कब थी।


नहीं होता यकीन फिर भी कर ही लेता हूँ,

जहाँ इतने हुए एक और फरेब हो जाने दो।


शायद इसी को कहते हैं मजबूरी-ए-हयात,

रुक सी गयी है उम्र-ए-गुरेजां तेरे बगैर।


मुझ पर करो सितम तो तरस मत खाना,

क्योकि खता मेरी है मोहब्बत मैंने की है।


मुझे मंज़ूर था हर सितम तेरा मेरे दिल पर,

पर तेरा छोड़ के जाना सजा-ए-मौत हो गयी।



 रात भर मुझको ग़म-ए-यार ने सोने न दिया,

सुबह को खौफ़-ए-शब-ए-तार ने सोने न दिया,

शमा की तरह मेरी रात कटी सूली पर,

चैन से याद-ए-कद-ए-यार ने सोने न दिया।


ज़माने से सुना था कि मोहब्बत हार जाती है,

जो चाहत एक तरफ हो वो चाहत हार जाती है।

कहीं दुआ का एक लफ्ज़ असर कर जाता हैं,

और कभी बरसों की इबादत भी हार जाती है।



ताबीर जो मिल जाती तो एक ख्वाब बहुत था,

जो शख्स गँवा बैठे है नायाब बहुत था,

मै कैसे बचा लेता भला कश्ती-ए-दिल को,

दरिया-ए-मुहब्बत मे सैलाब बहुत था।


मैं ख्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है,

सर-ए-आईना मेरा अक्स है, पस-ए-आईना कोई और है।


मैं किसी की दस्त-ए-तलब में हूँ, तो किसी की हर्फ़-ए-दुआ में हूँ,

मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे मांगता कोई और है।


मुझे तुझसे कोई शिकवा या शिकायत नहीं,

शायद मेरे नसीब में तेरी चाहत नहीं है,

मेरी तकदीर लिखकर खुदा भी मुकर गया,

मैंने पूछा तो बोला ये मेरी लिखावट नहीं है।


काश आ जाये वो मुझे जान से गुज़रते देखे,

ख्वाहिश थी कभी मुझ को बिखरते देखे।



वो सलीके से हुआ हम से गुरेज़ाँ वरना,

लोग तो साफ़ मोहब्बत से मुकरते देखे।


वक़्त होता है हर एक ज़ख़्म का मरहम,

फिर भी कुछ ज़ख़्म थे जो न भरते देखे।


दुआ नहीं तो गिला देता कोई,

मेरी वफाओं का सिला देता कोई।


जब मुकद्दर ही नहीं था अपना,

देता भी तो भला क्या देता कोई।


हासिल-ए-इश्क फकत दर्द है,

ये काश पहले बता देता कोई।


मेरे आँगन में कभी फूल खिला करते थे,

मेरी आँखों में भी कुछ ख्वाब बसा करते थे।


मुझ को हालात की आंधी ने गिराया वरना,

मेरे सीने में भी कुछ लोग रहा करते थे।


दिल से रोये मगर होंठो से मुस्कुरा बैठे,

यूँ ही हम किसी से वफ़ा निभा बैठे,

वो हमे एक लम्हा न दे पाए प्यार का,

और हम उनके लिये जिंदगी लुटा बैठे।


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