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Hindi Poem BEST KAVITA 2022

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 कपड़ों के अबोदाब दिखाने में रह गया 

कुछ खूबसूरतों को लुभाने में रह गया 

मुर्गे की तंग खा गए सादी में सारे लोग 

मैं दोस्तों  से हाँथ मिलाने में रह गया 

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कर गई घर मेरा खाली मेरे सो जाने के बाद 

मुझको धडका था की कुछ होगा तेरे आने के बाद 

मैंने दोनों बार थाने में लिखाई थी रपट 

एक तेरे आने से पहले एक तेरे जाने के बाद 


रुख पर क्रीम आँख में काजल बदन है फूल 

वो मेरे बस की है ना तेरे बस की है 

सत्रह बरस की बेटी थी जिश माँ की पिछले साल 

उस माँ की उम्र आज भी सोलह बरस की है 


सुक्र है छेड़छाड़ की तौहमत अब उसके सर नहीं आती 

ऐसा सुरमा लगा लिया उसने कोई सूरत नजर नहीं आती 


कितनी कंजूसी पे आमादा है ससुराल मेरी 

रात की बात बताने में डर लगता है 

ऐसे कमरे में सूला  देते हैं साले मुझको 

पाँव फैलाऊ तो दीवार में सर लगता है 


लगा रहता है खटका जाने क्या अंजाम हो जाए

खबर ये आम हो जाए तो फिर कोहराम हो जाए

मोहब्बत  हो गई है डाकू सुल्ताना  की बेटी से 

ना जाने किस गली में जिंदगी कि शाम हो जाए 


साल भर हो गया गुजरे हुए सम्मो को मेरे 

होंठ पर मायुशी का शाया नहीं होने देते 

रोज करते है नई अम्मी की बातें मुझसे

मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते । 


हालांकि तू जवान है मुटल्लो है आज भी 

फिर भी है तुझपे कितना मुझे एतबार देख 

खुदवा रहा हुं  कब्र तेरे लिए अभी से 

तू मेरा शौक देख मेरा इंतजार देख 


तकदीर का खोटा है मुकद्दर से लड़ा है 

लोग उसे कहते हैं पागल बड़ा है 

खुद तीस का है और दुल्हन साठ बरस की 

गिरती हुई दीवार के साये में खड़ा है 


फैसला जो कुछ भी हो मंजूर होना चाहिए 

जंग हो या प्यार हो भरपूर होना चाहिए 

कट चुकी है उम्र सारी जिनकी पत्थर तोड़ते 

अब तो इन हाथों में कोहिनूर होना चाहिए 


शाम भी खास है वक्त भी खास है 

मुझको अहसास है तुझको अहसास है 

इससे ज्यादा मुझे और क्या चाहिए 

मैं तेरे पास हूँ तू मेरे पास है । 


जैसा तन दिख रहा वैसा मन कीजिए 

ऐसा वैसा ना कोई जतन कीजिए 

तीर्थ के दौर में प्रेम करते नहीं 

ये उम्र है भजन की भजन कीजिए 


प्रीत में एक रत्न मैं जड़ू तुम जड़ों 

एक नया व्याकरण मैं गढ़ू तुम गढ़ों 

उलझने सब सुलझ जाएंगी पल में भी 

एक कदम एक कदम मैं बढ़ूँ तुम बढ़ो । 


छोडो मेहँदी खडक संभालो

खुद ही अपना चीर बचा लो

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,

मस्तक सब बिक जायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे|


कब तक आस लगाओगी तुम,

बिक़े हुए अखबारों से,

कैसी रक्षा मांग रही हो

दुशासन दरबारों से|


स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं

वे क्या लाज बचायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयंगे|


कल तक केवल अँधा राजा,

अब गूंगा बहरा भी है

होठ सी दिए हैं जनता के,

कानों पर पहरा भी है|


तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे,

किसको क्या समझायेंगे?

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे|

-पुष्यमित्र उपाध्याय


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