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कविता तिवारी की देशभक्ति कविता || Kavita Tiwari Ki Kavita Lyrics

 कविता तिवारी की देशभक्ति कविता || Kavita Tiwari Ki Kavita Lyrics


खोकर पाने का मज़ा ही कुछ और है,

रोकर मुस्कुराने का मज़ा ही कुछ और है,

हार तो जिंदगी का हिस्सा है मेरे दोस्त,

हार के बाद जीतने का मजा ही कुछ और है।

 

कभी हार नहीं होती...

लहरों को साहिल की दरकार नहीं होती,

हौसला बुलंद हो तो कोई दीवार नहीं होती,

जलते हुए चिराग ने आँधियों से ये कहा,

उजाला देने वालों की कभी हार नहीं होती।

 

Kavita Tiwari Ki Kavita Lyrics

कर्म करो बस तुम...

कर्म करो बस तुम अपना लोग उसे जानेगें ही,

आज नहीं तो कल ही सही लोग तुम्हें पहचानेगें ही।


मुश्किलें दिलों के इरादों को आजमाएंगी,

आँखों के पर्दों को निगाहों से हटाएँगी,

गिरकर भी हम को संभलना होगा,

ये ठोकरें ही हमको चलना सिखाएंगी।

 

हौसले बुलंद कर...

अपने हौसले बुलंद कर, मंज़िल तेरे बहुत करीब है,

बस आगे बड़ता जा, यह मंज़िल ही तेरा नसीब है।

 

इरादों में जीत...

जीत की ख़ातिर बस जूनून चाहिए,

जिसमें उबाल हो ऐसा खून चाहिए,

ये आसमां भी आ जाएगा ज़मीं पर,

बस इरादों में जीत की गूँज चाहिए।

 

पूरा आसमान चाहिए...

मंजिल पर सफलता का निशान चाहिए,

होंठों पे खिलती हुई मुस्कान चाहिए,

बहलने वाले नहीं हम छोटे से टुकड़े से,

हमें तो पूरा का पूरा आसमान चाहिए।


तालीमें नहीं दी जाती परिंदों को उड़ानों की,

वे खुद ही तय करते है, ऊँचाई आसमानों की,

रखते हैं जो हौसला आसमां को छूने का,

वो नहीं करते परवाह जमीन पे गिर जाने की।

 

कड़ी धूप में...

कड़ी धूप में चलता हूँ इस यकीन के साथ,

मैं जलूँगा तो मेरे घर में उजाला होगा।

 

जो तूफानों से...

मुस्कुराना मेरे दुखों पर छोड़ दे ऐ ज़माने,

मैं बुजदिल नहीं हूँ जो तूफानों से डर जाऊं,

मौत लिखी है किस्मत में तो लड़कर मरूंगा,

इतना कायर नहीं कि बातों से ही मर जाऊं।

 

यही जज्बा रहा तो...

यही जज्बा रहा तो मुश्किलों का हल भी निकलेगा,

जमीं बंजर हुई तो क्या वहीं से जल भी निकलेगा,

न मायूस हो न घबरा अंधेरों से मेरे साथी,

इन्हीं रातों के दामन से सुनहरा कल भी निकलेगा।

 

मुकद्दर खुद बनाता हूँ...

मुसीबत के साये में मैं हँसता-हँसाता हूँ,

ग़मों से उलझ कर भी मैं मुस्कराता हूँ,

हाथों में मुकद्दर की लकीरें है नहीं लेकिन,

मैं तो अपना मुकद्दर खुद बनाता हूँ।

 

समंदर को बड़ा गुमान...

सुना है आज समंदर को खुद पे गुमान आया है,

उधर ही ले चलो कश्ती जहाँ तूफान आया है।


kavita tiwari deshbhakti poem


काया में देशभक्ति का प्रवाह बनेगा

साहस से साजिशों का हर एक दुर्ग ढहेगा

जब तक सरहदों पर खड़े देश के जवान

ए हिन्द तू आजाद है आजाद रहेगा


राष्ट्रभक्ति का दीप जलाना सबको अच्छा लगता है

देश प्रेम का गीत सुहाना सबको अच्छा लगता है

जननी जन्मभूमि पर प्राणों से बढ़कर प्यारी होती है

देशवासियों के खातिर दुर्वित फुलवारी होती है

फिर भी प्रश्न खड़े होते हैं जगह जगह विस्फोटों से

माँ तेरी संतानोको कैसी लाचारी होती है


जब स्वदेश का बछा बछा बन्दे मातरम गायेगा

कोई आतंकवादी कैसे उग्रवाद अपनाएगा

आपना पूज्य तिरंगा नभ में फहर फहर फहेरायेगा

जो इसकी तौहीन करेगा मिट्टी में मिल जायेगा


आओ करें प्रतिज्ञा हम सब गौरवशाली भाषा में

क्यों जिन्दा हैं सिर्फ तिजोरी भरने की अभिलाषा में

क्यों आपने मन में औरों के खातिर पीर नही होती

एक तारीकी दुनिया में सबकी तकदीर नही होती

अरे मौत के सौदागर ओ नीच अधम हत्यारे सुन

मरने के जो संग चले ऐसी जागीर नही होती


अगर निरीह प्राणियों पर भी दया नही दिखलायेगा

धरती माता के दामन में गहरे दाग लगाएगा

है इतिहास गवाह कसम से रोयेगा पछतायेगा

जो इसकी तौहीन करेगा मिट्टी में मिल जायेगा


सुप्त मानसिकताएं आओ मिलकर उन्हें जगाएं हम

देश प्रेम की अविरत धारा को मिलकर अपनाएं हम

खुरापात हैं जिनके मन में वो नित रार ठानते हैं

कई वार पछ्ताएं होंगे फिर भी नही मानते हैं


चोरी छुपे वार करने के मना रहे जो मंसूबे

दुश्मन देश युवा भारत की ताक़त नही जानते हैं

गिधड को यदि मौत पड़ी है पास शहर के आएगा

देश द्रिहियों को "कविता" देश न हरगिज भायेगा


बोयेगा जो शूल बताओ फूल कहाँ से पायेगा

जो इसकी तौहीन करेगा मिट्टी में मिल जाएगा


माँ धरती धरती है संयम

सहती है खुद पर प्रबल भार

जीतने भी कोई जुल्म करे

पर नही मानती कभी हार

इस बसुंधरा पर अखिल विश्व

जिसकी भौगोलिक भाषा है

प्रत्येक खण्ड में सजे देश

सबकी यही अभिलाषा है

हर एक देश को नाज रहा

सच्चा है अथवा झूठा है

कर्तव्यो और उपायो से निर्मित

सम्मान अनूठा है

निज आर्यब्रत की ओर ध्यान आकृष्ट

कराने आई हूँ

 

कुछ शब्द सुमन वाली कविता स्वागत में चुनकर लायी हूँ

अपने अतीत का ज्ञान चक्षु हम सबको यह बतलाता है

नीतियाँ समर्पण वाली हों इतिहास अमर हो जाता है

चाहे हो कलुषित भाव किन्तु

दिखलादों अपना सरल हृदय सबसे करबद्ध निवेदन है

"बोलो भारत माता की जय"


छः ऋतुओ वाला श्रेष्ठ देश

दुनिया का सबसे ज्येष्ठ देश

अध्ध्यान करने पर पाओगे पूरी बसुधा पर है बिशेष

सभ्यता यहाँ पर जिंदा है पूजे जाते हैं संस्कार

कल कल कल करती हैं पावन नदियां लेकर अपनी धवल धार

हिमवान किरीट बना जिसका उत्तर में प्रहरी के समान

दक्षिण में सिंधु पखार चरण देता रहता है अभयदान

पूरव में खाड़ी का गौरव सीमा को रक्षित करता है

पश्चिम में अपना अरब सिंधु नित ऊर्जा का दम भरता है

त्योहार अनूठे लगते हैं व्यवहार अनूठे लगते हैं

खोजोगे तो पाओगे जबाव मनुहार अनूठे लगते है

ऐसी है भारत की धरती रहता है जहां जीव निर्भय

सत्ता से यदि हो गयी चूक तो ईश्वर करता है निर्णय

होगा बाल न बांका हरगिज़ कर लोगे यदि मन में निश्चय

सबसे करबद्ध निवेदन है "बोलो भारत मटा की जय"


मजदूर जहां श्रम साधक है

उस भूमि भाग का क्या कहना

नित मेहनत का आराधक है

उस भूमि भाग का क्या कहना

बढ़ती ही रहती है प्रतिपल

भारत माता की अमिट शान


पोषित करती है जो संज्ञा हम सब उसको कहते किसान

दर्शन दर्पण का करो चित्र

हर ओर भला है चंगा है

लहराता नील गगन पथ पर

वह अपना पूज्य तिरंगा है

तैयार हमेशा रहते हैं दुश्मन का दर्प मिटाने को

सकुचाते नहीं किशोर यहाँ बली वेदी पर चढ़ जाने को

बचना है या फिर मारना है करना है सिर्फ अखंड अजय

सबसे करबद्ध निवेदन है "बोलो भारत माता की जय"

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